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बस यूँ ही भाग 2

“बस यूँ ही…”
ज़िंदगी जितनी बड़ी है, उतनी ही छोटी भी।
कभी एक चाय की चुस्की में मुस्कान मिल जाती है,
कभी एक गली के मोड़ पर पुरानी यादें।
इस पुस्तक में सौरभ दत्त ने
उसी रोज़मर्रा की दुनिया को
हल्की-सी मुस्कराहट और नरम-सी नज़ाकत के साथ शब्दों में गूंथा है।
यहाँ आपको—
कभी पड़ोस वाली आंटी मिलेंगी,
कभी गोलगप्पों का फ़लसफ़ा,
कभी जिम न जाने के बहाने,
कभी रिश्तों की गंभीर पर सधी हुई परछाइयाँ,
कभी पंजाबियत की महक,
और कभी बचपन की सच्ची, मीठी यादें।
कविताएँ न तो दार्शनिक बनना चाहतीं हैं ,
और न ही उपदेश देना।
ये बस आपकी ही दुनिया हैं—
आपके ही घर की आवाज़ें,
आपके दिल के हल्के-फुल्के जज़्बात,
और ज़िंदगी की अनगिनत छोटी-छोटी हँसी।

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Weight 250 g
Dimensions 8.5 × 2 in

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